Q1. निरुक्त के आधार पर छः भाव विकारों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
- निरुक्त के अनुसार, 'षड्भावविकार' किसी भी वस्तु/भाव की छह क्रमिक अवस्थाएँ हैं।
- ये अवस्थाएँ हैं: जायते (जन्म लेना), अस्ति (होना), विपरिणमते (परिवर्तित होना)।
- शेष अवस्थाएँ: वर्धते (बढ़ना), अपक्षीयते (घट जाना), विनश्यति (नष्ट हो जाना)।
- यास्क ने इन्हें क्रियापदों के अर्थ और 'भाव' (सत्ता) की प्रकृति समझने हेतु प्रस्तुत किया।
Answer: निरुक्त भारतीय वाङ्मय के षड्वेदांगों में से एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसका मुख्य उद्देश्य वैदिक शब्दों के अर्थ का विवेचन करना और उनकी व्युत्पत्ति को स्पष्ट करना है। महर्षि यास्क निरुक्त के प्रणेता हैं और उन्होंने अपने ग्रंथ 'निरुक्त' में शब्दों के स्वरूप, धातु-प्रत्यय संबंध और अर्थ निर्धारण के नियमों का विस्तृत वर्णन किया है। इसी संदर्भ में, यास्क ने 'भाव विकार' (modifications of being) की अवधारणा प्रस्तुत की है, जो किसी भी पदार्थ या भाव की छह अवस्थाओं का क्रमिक वर्णन करती है। यास्क ने कहा है कि क...