Q1. न्याय-वैशेषिक दर्शन में आत्मा को 'ज्ञान का आधार' क्यों माना गया है, 'ज्ञान-स्वरूप' क्यों नहीं? जीवात्मा और परमात्मा के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए ।
- न्याय-वैशेषिक में आत्मा एक द्रव्य है, ज्ञान इसका आगंतुक गुण है, न कि स्वरूप।
- आत्मा स्वयं मूल रूप में जड़ है; ज्ञान मन, इंद्रियों और विषयों के संपर्क से उत्पन्न होता है।
- यदि आत्मा ज्ञान-स्वरूप होती, तो गहरी नींद में भी ज्ञान रहता, जो अनुभव के विपरीत है।
- जीवात्मा अनेक होती हैं, कर्मों से बंधी, सुख-दुःख भोगती और मोक्ष प्राप्त करती हैं।
Answer: न्याय-वैशेषिक दर्शन भारतीय दर्शन की एक महत्वपूर्ण शाखा है जो तर्क और ज्ञानमीमांसा पर बल देती है। इस दर्शन में आत्मा (Atma) को एक शाश्वत, सर्वव्यापी द्रव्य (substance) के रूप में स्वीकार किया गया है, जिसकी अपनी विशिष्ट विशेषताएँ हैं। यह आत्मा को 'ज्ञान का आधार' मानता है, न कि 'ज्ञान-स्वरूप'। न्याय-वैशेषिक के अनुसार, आत्मा एक विशेष प्रकार का द्रव्य है जो ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न जैसे गुणों (qualities) का आश्रय या आधार है। आत्मा स्वयं अपने मूल रूप में जड़ (unconscious) मानी जाती ह...