Qखण्ड-1.1. प्रमाण सिद्धान्त के उद्भव से क्या समझते है? इसके विकास का भी वर्णन कीजिए।
- प्रमाण वह साधन है जिससे वैध और यथार्थ ज्ञान (प्रमा) प्राप्त होता है।
- प्रमाण सिद्धान्त का उद्भव तत्त्वज्ञान और मोक्ष प्राप्ति हेतु विश्वसनीय ज्ञान की आवश्यकता से हुआ।
- न्याय दर्शन ने प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द – चार प्रमाणों का व्यवस्थित प्रतिपादन किया।
- मीमांसा दर्शन ने प्रमाणों की संख्या बढ़ाकर पाँच (अर्थापत्ति) या छह (अनुपलब्धि) की।
Answer: ज्ञान-मीमांसा में 'प्रमाण सिद्धान्त' का उद्भव भारतीय दर्शन में वैध ज्ञान (प्रमा) को अवैध ज्ञान या संशय से अलग करने की मूलभूत आवश्यकता से हुआ। 'प्रमाण' वह साधन है जिसके द्वारा हमें यथार्थ और निश्चित ज्ञान प्राप्त होता है। भारतीय दार्शनिकों का मूल उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना या तत्त्वज्ञान को समझना था, जिसके लिए अविश्वसनीय ज्ञान साधनों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता था। प्रमाण सिद्धान्त का उद्भव विशेष रूप से वैदिक काल के बाद उपनिषदों और सूत्र काल में हुआ, जब विभिन्न दार्शनिक प्रणालियाँ विकसित हो रही ...