Q1. निम्नलिखित गद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए :
- (क)) “जन्म भर निर्लोभ रहने के बाद इस समय अपनी आत्मा का बलिदान करने में दारोगा जी को बड़ा दुःख होता था। वह सोचते थे, यदि यही करना था तो आज से पच्चीस साल पहले ही क्यों न किया, अब तक सोने की दीवार खड़ी कर दी होती। इलाके ले लिए होते। इतने दिनों तक त्याग का आनंद उठाने के बाद बुढ़ापे में यह कलंक! प्र मन कहता था, इसमें तुम्हारा क्या अपराध? तुमने जब तक निभ सका, निबाहा। भोग विलास के पीछे अधर्म नहीं किया, लेकिन जब देश, काल, प्रथा, और अपने बंधुओं का लोभ तुम्हें कुमार्ग की ओर ले जा रहे हैं, तो तम्हारा दोष? तुम्हारी आत्मा अब भी पवित्र है। तुम ईश्वर के सामने अब भी निरपराध हो। इस प्रकार तर्क करके दारोगा जी ने अपनी आत्मा को समझ लिया।” (400 words)
- (ख)) “जीवन-सूत्र कितना कोमल है। वह क्या पुष्प से कोमल नहीं, जो वायु के झोंके सकता है और मुरझाता नहीं? क्या वह लताओं से कोमल नहीं, जो कठोर वृक्षों के झोंके सहती और लिपटी रहती है? वह क्या पानी के बबूलों से कोमल नहीं, जो जल की तरंगों पर तैरते हैं, और टूटते नहीं? संसार में और कौन-सी वस्तु इतनी कोमल इतनी अस्थिर, इतनी सारहीन है जिससे एक व्यंग्य, एक कठोर शब्द, एक अन्योक्ति भी दारुण, असह्य, घातक है! और इस भित्ति पर कितने विशाल कितने भव्य, कितने बृहदाकार भवनों का निर्माण किया जाता है।” (400 words)
- (ग)) “मैं कुछ नहीं चाहती। मैं इस घर का एक तिनका भी अपने साथ न ले जाऊँगी। जिस चीज पर मेरा कोई अधिकार नहीं, वह मेरे लिए वैसी ही है जैसी किसी गैर आदमी की चीज। मैं दया की भिखारिणी न बनूँगी। तुम इन चीजों के अधिकारी हो, ले जाओ। मैं जरा भी बुरा नहीं मानती! दया की चीज न जबरदस्ती दी जा सकती है। न जबरदस्ती ली जा सकती है। संसार में हजारों विधवाएँ हैं, जो मेहनत-मजूरी करके अपना निर्वाह कर रही हैं। मैं भी वैसे ही हूँ। मैं भी उसी तरह मजूरी करूँगी और अगर न कर सकूँगी, तो किसी गड्ढे में डूब मरूँगी। जो अपना पेट भी न पाल सके, उसे जीते रहने का, दूसरों का बोझ बनने का कोई हक नहीं है।” (400 words)
- (घ)) “किसान कुली बनकर कभी अपने भाग्य विधाता को धन्यवाद नहीं दे सकता, उसी प्रकार जैसे कोई आदमी व्यापार का स्वतंत्र सुख भोगने के बाद नौकरी की पराधनीता को पसंद नहीं सकता। संभव है कि अपनी दीनता उसे कुली बने रहने पर मजबूर करे, पर मुझे विश्वास है कि वह इस दासता से मुक्त होने का अवसर पाते ही तुरंत अपने घर की राह लेगा और फिर उसी टूटू-फूटे झोपड़े में अपने बाल-बच्चों के साथ रहकर संतोष के साथ कालक्षेप करेगा। आपको इसमें कुछ संदेह हो तो आप कृषक-कुलियों से एकांत में पूछकर अपना समाधान कर सकते हैं। मैं अपने अनुभव के आधार पर यह बात कहता हूँ कि आप लोग इस विषय में योरोप वालों का अनुकरण के आधार करके हमारी जातीय जीवन के सद्गुणों का सर्वनाश कर रहे हैं। योरोप में इंडिस्ट्रियलिज्म (औद्योगिकता) की जो उन्नति हुई उसके विशेष कारण थे। वहाँ के किसानों की दशा उस समय गुलामों से गयी-गुजरी थी, वह जमींदार के बंदी होते थे। इस कठिन कारावास के देखते हुए धनपतियों की कैद गनीमत थी। हमारे किसानों की आर्थिक दशा चाहे कितनी ही बुरी क्यों न हो, पर वह किसी के गुलाम नहीं हैं। अगर कोई उन पर अत्याचार करे तो वह अदालतों में उससे मुक्त हो सकते हैं। नीति की दृष्टि में किसान और जमींदार दोनों बराबर हैं।” (400 words)
- दारोगा रामनाथ का आत्म-संघर्ष 'गबन' में नैतिक पतन और आत्म-छल का चित्रण करता है।
- मानवीय जीवन सूत्र 'गोदान' में अत्यंत कोमल है, जो शब्दों के गहरे घावों के प्रति संवेदनशील है।
- धनिया का स्वाभिमान 'गोदान' में नारी सशक्तिकरण, दया की अस्वीकृति और आत्मनिर्भरता को दर्शाता है।
- प्रेमचंद भारतीय किसान की स्वतंत्रता और गरिमा को औद्योगिक श्रमिक की पराधीनता से श्रेष्ठ मानते हैं।
Answer: प्रेमचंद के उपन्यासों से लिए गए ये गद्यांश उनके गहन सामाजिक यथार्थवाद, मानवीय मनोविज्ञान की गहरी समझ और सामाजिक-नैतिक मुद्दों पर उनके प्रगतिशील विचारों को प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक अंश चरित्रों के आंतरिक संघर्ष, जीवन की दार्शनिक जटिलताओं और तत्कालीन समाज की विवशताओं का सशक्त चित्रण करता है। लेखक आत्म-छल, मानवीय संवेदना की नाजुकता, नारी स्वाभिमान और औद्योगिकरण के प्रभावों जैसे विषयों को बड़ी सूक्ष्मता से उद्घाटित करते हैं।