Q1. निम्नलिखित अवतरणों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए।
- (क)) युद्ध क्या गान है? रूद्र का शृंगीनाद्, भैरवी का तांडव नृत्य और शस्त्रों का वाद्य मिलकर एक भैरव-संगीत की सृष्टि होती है। जीवन के अंतिम दृश्य को जानते हुए, अपनी आंखों से देखना, जीवन-रहस्य के चरम सौंदर्य की नग्न और भयानक वास्तविकता का अनुभव-केवल सच्चे वीर-हृदय को होता है, ध्वंसमयी महामाया प्रकृति का वह निरंतर संगीत है। उसे सुनने के लिए हृदय में साहस और बल एकत्र करो। अत्याचार के श्मशान में ही मंगल का-शिव का सत्य सुंदर संगीत का समारंभ होता है। (350 words)
- (ख)) मैं दो बड़े पहियों के बीच लगा हुआ एक छोटा निरर्थक शोभा-चक्र हूँ जो बड़े पहियों के साथ घूमता है पर रथ को आगे नहीं बढ़ाता और न धरती ही छू पाता है! और जिसके जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह धुरी से उतर भी नहीं सकता! (350 words)
- (ग)) धर्म, नीति, मर्यादा, यह सब हैं केवल आडम्बर मात्र, मैंने यह बार-बार देखा था। निर्णय के क्षण में विवेक और मर्यादा व्यर्थ सिद्ध होते आये हैं सदा हम सब के मन में कहीं एक अंध गह्वर है। बर्बर पशु, अंधा पशु वास वहीं करता है, स्वामी जी हमारे विवेक का, नैतिकता, मर्यादा, अनासक्ति, कृष्णार्पण यह सब है अंधी प्रवृत्तियों की पोशाकें जिनमें कटे कपड़ों की आँखें सिली रहती हैं मुझको इस झूठे आडम्बर से नफरत थी इसलिए स्वेच्छा से मैंने इन आँखों पर पट्टी चढ़ा रखी थी। (350 words)
- (घ)) साँच कहैं ते पनही खावैं। झूठे बहु विधि पदबी पावैं। छलियन के एका के आगे। लाख कहौ एकहु नहिं लागे ।। भीतर होइ मलिन की कारो। चाहिए बाहर रंग चटकारो।। धर्म अधर्म एक दरसाईं। राजा करे सो न्याव सदाई।। भीतर स्वाहा बाहर सादे। राज करहि अगले अरू प्यादे।। अंधाधुंध मच्यौ सब देसा। मानहुँ राजा रहत विदेसा।। गो द्विज श्रुति आदर नहिं होई। मानहुँ नृपति विधर्मी कोई ।। (350 words)
- युद्ध की विनाशलीला में भी 'भैरव-संगीत' और नए सत्य के उदय की दार्शनिक संभावना ('अंधा युग').
- नंद द्वारा स्वयं को 'निरर्थक शोभा-चक्र' कहना, जो उसकी अस्तित्वगत निरर्थकता और निर्णयहीनता को दर्शाता है ('लहरों के राजहंस').
- नैतिक मूल्यों और सामाजिक मर्यादाओं को 'आडम्बर' मानकर मानव स्वभाव की पाशविक प्रवृत्तियों का क्रूर चित्रण ('अंधा युग').
- सत्य की उपेक्षा, छल-कपट का वर्चस्व और राजा के मनमाने न्याय का व्यंग्यात्मक चित्रण ('अंधेर नगरी').
Answer: IGNOU के MHD-04 पाठ्यक्रम 'नाटक एवं अन्य गद्य विधाएँ' में विभिन्न नाटकों और गद्य रचनाओं के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक और मानवीय अस्तित्व के गहन मुद्दों पर विचार किया गया है। प्रस्तुत अवतरण इन विषयों के महत्वपूर्ण आयामों को उजागर करते हैं, जहाँ लेखक पात्रों के संवादों, प्रतीकों और व्यंग्य के माध्यम से समाज, व्यक्ति और सत्ता की जटिलताओं का विश्लेषण करते हैं। इन अंशों की संदर्भ सहित व्याख्या इन कृतियों की दार्शनिक गहराई और साहित्यिक महत्ता को समझने में सहायक होती है।