Q1. पृथ्वीराज रासो की भाषा पर प्रकाश डालिए।
- पृथ्वीराज रासो की भाषा अपभ्रंश और प्रारंभिक हिंदी के बीच संक्रमणकालीन स्वरूप की है।
- इसमें राजस्थानी (डिंगल) और ब्रजभाषा (पिंगल) दोनों शैलियों का विशिष्ट मिश्रण मिलता है।
- भाषा में संस्कृत के तत्सम, तद्भव और लोकभाषा के देशज शब्दों का प्रचुर प्रयोग हुआ है।
- रासो की व्याकरणिक संरचना प्राचीनता लिए हुए है, जो आधुनिक हिंदी से भिन्न रूप दर्शाती है।
Answer: पृथ्वीराज रासो, हिंदी साहित्य के आदिकाल के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं बहुचर्चित ग्रंथों में से एक है, जिसकी भाषा को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। यह महाकाव्य उस संक्रमणकालीन दौर का प्रतिनिधित्व करता है, जब अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं, विशेषकर हिंदी का विकास हो रहा था। इसकी भाषा न तो पूर्णतः अपभ्रंश है और न ही पूर्णतः विकसित हिंदी, बल्कि दोनों का एक जटिल मिश्रण प्रस्तुत करती है। रासो की भाषा पर अपभ्रंश का गहरा प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। इसमें अपभ्रंशकालीन ध्वनि परिवर्तन जै...