Q1. गीता के अनुसार भगवान की सर्वव्यापकता के स्वरूप को स्पष्ट कीजिये।
- भगवान कृष्ण समस्त सृष्टि के आदि, मध्य और अंत हैं, जो इसकी उत्पत्ति, स्थिति और लय के मूल आधार हैं।
- भगवान प्रत्येक शरीर में क्षेत्रज्ञ के रूप में और सभी प्राणियों के हृदय में अंतरयामी परमात्मा के रूप में विराजमान हैं।
- विभूति योग (अध्याय 10) हर उत्कृष्ट वस्तु में भगवान की विशेष अभिव्यक्ति के रूप में उनकी सर्वव्यापकता दर्शाता है।
- विश्वरूप दर्शन (अध्याय 11) भगवान की सर्वव्यापकता का चरम प्रदर्शन है, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड उनके विराट स्वरूप में समाहित दिखता है।
Answer: MBG-004 'अक्षरब्रह्म एवं राजविद्यायोग' के अंतर्गत भगवद्गीता भगवान की सर्वव्यापकता (Omnipresence) के स्वरूप को अत्यंत गहनता और विस्तार से प्रतिपादित करती है। यह सर्वव्यापकता केवल एक दार्शनिक अवधारणा नहीं है, बल्कि एक जीवंत सत्य है जिसे विभिन्न आयामों से समझाया गया है ताकि साधक भगवान की उपस्थिति को हर स्थान, हर वस्तु और हर प्राणी में अनुभव कर सकें। गीता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को परम ब्रह्म और समस्त सृष्टि का आधार बताते हैं, जो स्थूल और सूक्ष्म, साकार और निराकार दोनों रूपों में व्याप्त है...