Q1. निम्नलिखित पद्यांशों की ससंदर्भ व्याख्या कीजिए :
- (क)) मनन करावेगी तू कितना ? उस निश्चिंत जाति का जीव, अमर मरेगा क्या? तू कितनी गहरी डाल रही है नींव । आह घिरेगी हृदय - लहलहे, खेतों पर करका-घन-सी, छिपी रहेगी अंतरतम में, सब के तू निगूढ़ धन - सी । (500 words)
- (ख)) दिवसावसान का समय मेघमय आसमान से उतर रही है वह संध्या- सुंदरी परी-सी धीरे धीरे धीरे, तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास, मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर - किंतु गंभीर -नहीं है उनमें हास-विलास । (500 words)
- (ग)) छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले! तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन? भूल अभी से इस जग को! (500 words)
- (घ)) जाग तुझको दूर जाना जाग तुझको दूर जाना चिर सजग आँखे उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! (500 words)
- छायावाद प्रकृति, सौंदर्य, प्रेम, रहस्यवाद और वैयक्तिक भावनाओं को सूक्ष्म व प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करता है।
- सुमित्रानंदन पंत की 'परिवर्तन' जीवन की नश्वरता व परिवर्तन की शाश्वत शक्ति का दार्शनिक चिंतन है।
- निराला की 'संध्या-सुंदरी' संध्या का मानवीकरण कर प्रकृति के रहस्यमयी सौंदर्य व शांति का चित्रण करती है।
- पंत की 'बालिका के प्रति' प्रकृति प्रेम और मानवीय सौंदर्य के प्रति कवि के आंतरिक द्वंद्व को दर्शाती है।
Answer: छायावाद हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण काव्य आंदोलन है, जो 1918 से 1936 के बीच अत्यधिक प्रभावी रहा। इसमें प्रकृति, सौंदर्य, प्रेम, रहस्यवाद और वैयक्तिक भावनाओं को सूक्ष्म और प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त किया जाता है। प्रस्तुत पद्यांश छायावाद के प्रमुख स्तंभों - जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा - की रचनाओं से उद्धृत हैं। इन अंशों की ससंदर्भ व्याख्या करते हुए हम छायावादी काव्य की विशिष्टताओं, जैसे लाक्षणिकता, मानवीकरण, कल्पनाशीलता और गहन भावात्मकता को समझ...